कब तक? किस लिए? किससे? और क्यों ?
कब तक हमें बचकर चलना है ?
क्यों हमे बचकर चलना है?
किससे हमे बचकर चलना है ?
किस किस से हमे बचकर चलना है?

ठीक है , अब हम मिनी स्कर्ट नही पहनेंगे ।
पहन लेंगे अब सलवार कमीज,
जिसे आप सादगी, शर्म का हिजाब कहते हैं।

और अपने वक्ष पर डाल लेंगे दुप्पट्टा भी।
सुना है जहाँ से माँ का दूध पीया था तुमने,
वो जगह तुम्हे अब उकसाती है?
जिसे पी कर बने हो मर्द तुम,
वही जगह तुम्हारा मन ललचाती है?

पर इस बात का दायित्व लेते हो क्या ?
की कोई हमारा दुपट्टा ना खींचे ?
तो बुरखा पहन कर भी निकलेगें हम,
जो तुम्हारी आँखें बुरखे के अंदर ना झांकें ?

चलो हम घर से निकलना बंद कर देंगें,
पर इस बात का जिम्मा उठाते हो क्या
की कोई घर तक हमारे पिछे ना आए ?
या इस बात का आश्वासन देते हो,
की घर में घुसकर, कोई हमारा चरित्र हनन ना कर पाए ?

कलम उठाने निकले थे घर से,
बोलो तो अब शस्त्र भी उठा लेंगे?
तुमने मर्दानगी अपनी शोषण करके ही दिखानी है अगर,
तो अब हम
मर्दानी भी बन लेंगें ।

मत करो ऐसा हमारे साथ।
ह्रदय काँप जाता है।
मन कुंठित हो जाता है ,
सोच पर अंकुश लग जाता है ।

माँ बाप घबरा जाते हैं,
जब हम घर से अकेले निकलते हैं।
बोलो कब तक आबरु को बोझ समझ कर चलते रहें?
हम बेफिक्र चलने को कब तक तरसते रहें?

अकेले जा रही है , चलो उसे छू कर गुजर जाते हैं।
अरे ! हाथ ना फेर पाए उस पर ।
चलो उसकी स्कर्ट, उसका दुप्पट्टा ही खींच लेते हैं ।

मर्द हो तुम? ये कैसी विकृत प्रवृति है ?
उसका चरित्र हनन करने में तुले हो,
जो स्त्री माँ, बहन, प्रेमिका की पावन आकृति है ?

आश्वासन नही चाहिए, ना अब राय चाहिए ।
हम सुरक्षित घर से किसी भी वक्त निकल पाएँ ,
ऐसा भारत चाहिए , ऐसा कानून, ऐसा न्याय चाहिए ।।

– मिताली

Share your opinion